मार्शल आर्ट की हत्या: क्या हम 'खेल' के नाम पर एक प्राचीन विद्या को खो रहे हैं?

लेखक: किशोर प्रजापति 

संस्था: ज्वाला टेम्पल ऑफ मार्शल आर्ट (Jwala Temple Of Martial Art)

आदरणीय सरकार और खेल नीति निर्धारकों,
आज मैं एक मार्शल आर्ट कोच के रूप में, एक ऐसे कड़वे सच को सामने रखना चाहता हूँ जिसे अक्सर मेडल और ट्राफियों की चमक के पीछे छुपा दिया जाता है। यह गुजारिश सिर्फ़ मेरी नहीं, बल्कि उस हर सच्चे साधक की है जिसने अपनी जवानी के 15-20 साल इस कला को सीखने में खपा दिए हैं।
मेरी सरकारों से एक सीधी और स्पष्ट माँग है: कृपया 'मार्शल आर्ट' को 'खेलों' (Sports) की श्रेणी से बाहर निकाल दीजिए और मार्शल आर्ट को बचा लीजिए।
समस्या क्या है?
आज हम एक अजीब दौर में जी रहे हैं। गली-गली में मार्शल आर्ट अकादमियाँ खुल रही हैं, लेकिन वहां मार्शल आर्ट नहीं, सिर्फ 'खेल' सिखाया जा रहा है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि आज 17 या 18 साल का एक लड़का खुद को 'मार्शल आर्ट कोच' कह रहा है।
जरा सोचिए, जिस विद्या को समझने में, जिसके दर्शन (Philosophy) को जीने में और जिसके तकनीकों में पारंगत होने में एक व्यक्ति को कम से कम 15 साल की तपस्या लगती है, वहां एक कल का बच्चा 'गुरु' या 'कोच' कैसे बन सकता है?
यह संभव इसलिए हुआ है क्योंकि हमने 'मार्शल आर्ट' और 'खेल' के बीच की रेखा को मिटा दिया है।
खिलाड़ी (Player) और योद्धा (Warrior) का अंतर
हमें यह समझना होगा कि एक 'खिलाड़ी' और एक 'मार्शल आर्टिस्ट' में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
नियम बनाम जीवन: खेल (जैसे कराटे स्पोर्ट्स, ताइक्वांडो, कूड़ो आदि) नियमों के दायरे में खेले जाते हैं। वहां रेफरी होता है, पॉइंट्स होते हैं, सुरक्षा गियर होते हैं। लेकिन असली मार्शल आर्ट 'नियमों' का मोहताज नहीं है; वह जीवन रक्षा और अस्तित्व (Survival) की कला है।
मेडल बनाम महारत: एक खिलाड़ी का लक्ष्य मेडल जीतना होता है। एक मार्शल आर्टिस्ट का लक्ष्य खुद पर विजय प्राप्त करना और जीवन भर सीखते रहना होता है।
समय सीमा: एक खिलाड़ी का करियर 30-35 साल की उम्र तक ढलने लगता है, जबकि एक सच्चा मार्शल आर्टिस्ट उम्र के साथ और अधिक घातक और समझदार होता जाता है।
जब एक 18 साल का लड़का स्टेट या नेशनल में मेडल जीत लेता है, तो वह एक बेहतरीन 'खिलाड़ी' हो सकता है, लेकिन वह 'कोच' नहीं हो सकता। उसे अभी जीवन का अनुभव नहीं है, उसे शरीर विज्ञान (Anatomy) की गहरी समझ नहीं है, उसे अभी यह नहीं पता कि यह कला किसी का जीवन कैसे बदल सकती है। फिर भी, वह अपनी दुकान खोलकर बैठ जाता है, क्योंकि उसके पास एक सर्टिफिकेट है जिस पर लिखा है—"मार्शल आर्ट"।
मेरा सुझाव और माँग
इस भ्रम को तोड़ने के लिए, मैं सरकार और खेल मंत्रालय से यह अनुरोध करता हूँ कि शब्दावली (Terminology) में कड़े बदलाव किए जाएं:
नाम में सुधार: जितने भी कॉम्पिटिटिव फाइटिंग गेम्स हैं, उनके नाम से 'मार्शल आर्ट' शब्द हटा दिया जाए या प्रतिबंधित कर दिया जाए। उन्हें स्पष्ट रूप से 'खेल' कहा जाए।
कराटे मार्शल आर्ट ❌ → कराटे खेल (Karate Sport) ✅
ताइक्वांडो मार्शल आर्ट ❌ → ताइक्वांडो खेल (Taekwondo Sport) ✅
कूड़ो मार्शल आर्ट ❌ → कूड़ो खेल (Kudo Sport) ✅
कोचिंग के लिए मापदंड: मार्शल आर्ट कोच बनने के लिए सिर्फ मेडल काफी नहीं होना चाहिए। इसके लिए एक निश्चित उम्र, अनुभव के वर्ष (कम से कम 10-15 वर्ष) और गहन प्रशिक्षण अनिवार्य होना चाहिए।
निष्कर्ष
अगर हमने आज यह कदम नहीं उठाया, तो आने वाले समय में हमारे पास सिर्फ 'खिलाड़ी' बचेंगे, 'योद्धा' नहीं। हमारे पास सिर्फ मेडल होंगे, लेकिन वह अनुशासन, वह सम्मान और वह रूहानी ताकत नहीं होगी जो असली मार्शल आर्ट की पहचान है।
मार्शल आर्ट को एक 'व्यापार' और 'तमाशा' बनने से रोकिए। खेलों को खेल रहने दीजिए और कला को कला।
#sports vs #martialart 

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