गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026

₹35 से पद्मश्री तक — नाना पाटेकर की कहानी

 

₹35 से पद्मश्री तक — नाना पाटेकर की कहानी






कुछ लोग अभिनेता बनते हैं, और कुछ लोग अपने जीवन को इतना गहराई से जीते हैं कि उनका अभिनय भी जीवन का आईना बन जाता है। नाना पाटेकर उन्हीं कलाकारों में से एक थे।

जिस व्यक्ति को आज भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में गिना जाता है, उसने अपने सफर की शुरुआत किसी फिल्मी परिवार से नहीं, बल्कि संघर्ष से की थी।

मुंबई में आर्थिक कठिनाइयों के बीच किशोर उम्र में नाना पाटेकर ने फिल्म पोस्टर पेंट करने का काम किया। रिपोर्टों के अनुसार उस समय उन्हें करीब ₹35 महीने मिलते थे और एक वक्त का भोजन भी। पढ़ाई के साथ काम करना उनकी मजबूरी थी, लेकिन शायद यही संघर्ष आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत बना।

नाना ने सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट/इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से कला की शिक्षा ली। यानी जिस हाथ में कभी फिल्म के पोस्टर का ब्रश था, उसी हाथ ने आगे चलकर भारतीय सिनेमा में अभिनय की ऐसी लकीर खींची जिसे मिटाना आसान नहीं।

फिर आया रंगमंच और सिनेमा

नाना पाटेकर ने अभिनय की दुनिया में कदम रखा और वर्ष 1978 की फिल्म 'गमन' से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ। लेकिन पहचान उन्हें तुरंत नहीं मिली। वर्षों तक उन्होंने संघर्ष किया, छोटे-बड़े किरदार निभाए और रंगमंच से अपनी अभिनय क्षमता को लगातार निखारा।

फिर आया 'परिंदा'।

इसके बाद 'क्रांतिवीर', 'अग्निसाक्षी', 'अब तक छप्पन', 'वेलकम', 'राजनीति' और 'नटसम्राट' जैसी फिल्मों ने यह साबित कर दिया कि नाना केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि अपने आप में एक अभिनय संस्था हैं।

उनकी आवाज, संवाद बोलने का अंदाज और आंखों से भाव व्यक्त करने की क्षमता उनकी पहचान बन गई।

'क्रांतिवीर' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके अलावा परिंदा और अग्निसाक्षी के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। इस तरह उनके खाते में कुल तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार आए।

लेकिन नाना की कहानी सिर्फ सिनेमा की कहानी नहीं है...

उनके जीवन का एक और अध्याय भारतीय सेना से जुड़ा था।

फिल्म 'प्रहार: द फाइनल अटैक' के लिए नाना पाटेकर ने वास्तविक सैन्य प्रशिक्षण लिया। उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के जवानों के साथ कठोर प्रशिक्षण किया। यही नहीं, उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने करीब तीन वर्ष तक सैन्य प्रशिक्षण और जवानों के साथ अभ्यास किया था।

यह सिर्फ किसी फिल्मी भूमिका की तैयारी नहीं थी।

1999 में जब कारगिल युद्ध हुआ, तब नाना ने सेना के जवानों के साथ मोर्चे के करीब जाने की इच्छा जताई। विशेष अनुमति लेकर वे युद्ध क्षेत्र में सैनिकों के साथ रहे। उन्होंने बाद में अपने अनुभवों के बारे में बताया कि वे सैनिकों के साथ रहे और क्विक रिएक्शन टीम (QRT) के साथ भी जुड़े रहे।

यही वह जगह है जहां नाना पाटेकर और उनके निभाए किरदार के बीच का अंतर धुंधला होता दिखाई देता है।

जिस अभिनेता ने पर्दे पर सैनिक का किरदार निभाया, उसने वास्तविक जीवन में भी सैनिकों के बीच जाकर उस जीवन को महसूस किया।

संघर्ष से सम्मान तक

नाना पाटेकर की उपलब्धियां केवल पुरस्कारों की सूची नहीं हैं।

एक ऐसा बच्चा जिसने आर्थिक तंगी में फिल्म पोस्टर पेंट किए...

जिसने पढ़ाई के साथ काम किया...

जिसने थिएटर में खुद को तराशा...

जिसने वर्षों तक पहचान के लिए संघर्ष किया...

जिसने फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए...

और जिसने सेना के अनुशासन और कठिन प्रशिक्षण को भी अपने जीवन का हिस्सा बनाया...

उसी कलाकार को भारत सरकार ने वर्ष 2013 में कला के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया। सरकारी पद्म पुरस्कार रिकॉर्ड में उनका नाम 'Vishwanath Dinkar Patekar alias Nana Patekar' के रूप में दर्ज है।

₹35 की नौकरी से पद्मश्री तक...

नाना पाटेकर की कहानी हमें यह बताती है कि शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन मंजिल छोटी होना जरूरी नहीं।

कभी पोस्टर पर रंग भरने वाला एक संघर्षशील लड़का आगे चलकर करोड़ों दिलों में अपने अभिनय के रंग भर गया।

उनकी कहानी सिर्फ बॉलीवुड की सफलता की कहानी नहीं है।

यह कहानी है संघर्ष की।
अनुशासन की।
कला की।
देश के प्रति सम्मान की।
और सबसे बढ़कर—अपने रास्ते पर टिके रहने की।

₹35 महीने से शुरू हुआ सफर पद्मश्री तक पहुंचा।

और शायद नाना पाटेकर की सबसे बड़ी उपलब्धि कोई पुरस्कार नहीं, बल्कि यह है कि उन्होंने अपने अभिनय से यह साबित किया कि सच्चा कलाकार किरदार को सिर्फ निभाता नहीं—उसे जीता है।












मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

जब इनकीं शादी हो रही थी तब लगभग सारे भारत के लोगो ने इनकीं हँसी उड़ाई थी कि *पैसा बोलता है


जब इनकीं शादी हो रही थी तब लगभग सारे भारत के लोगो ने इनकीं हँसी उड़ाई थी कि *पैसा बोलता है*

आज इनका टेलेन्ट देखिये ।

पहली बार सुनी इनकी स्पीच,
इतना धाराप्रवाह बोलने वाले अनंत अम्बानी का भाषण, शब्दों का चयन काबिले तारीफ 
अविश्वसनीय, विस्मरणीय है

#anantambani 
#अनंतअम्बानी

गुरुवार, 25 जून 2026

#इमरजेंसी की इकलौती वजह क्या हाईकोर्ट का फैसला था ?

#इमरजेंसी की इकलौती वजह क्या हाईकोर्ट का फैसला था ?
            
                 
                      इलाहाबाद हाईकोर्ट अपना फैसला दे चुका था। अब सबकी निगाहें इंदिराजी के अगले कदम पर थीं। विपक्ष इस्तीफे का दबाव बढ़ा रहा था। तो समर्थक चुनाव में मिले विपुल जनादेश का हवाला दे रहे थे। दिल्ली के साथ ही पड़ोसी राज्यों से आने वाले या फिर लाये जाने वाले हुजूम 1,सफदरजंग पर जुटकर मरने-मिटने की कसमें खा रहे थे। वफ़ादारी की होड़ में पार्टी नेता और राज्यों के मुख्यमंत्री सब शामिल थे। किसी कड़े कदम की #आहट थी। पर वह क्या होगा ? क्या यह हालात सिर्फ 12 जून के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले की देन थे ? वापस लौटते हैं। याद करते हैं 15 अगस्त 1947 की आधी रात की। तब देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने देश की आजादी की घोषणा की थी। उस रात देश सोया नहीं था। सूरज जल्दी झांका था। अगली सुबह उम्मीद और उल्लास के नए उजाले के साथ आयी थी। 28 वर्ष के अंतराल पर। 25 जून 1975 की तारीख। वक्त तब भी आधी रात का था। लेकिन उस रात का फैसला आजादी की आत्मा ' लोकतंत्र ' के अपहरण का था। विडंबना यह कि यह फैसला लोकतंत्र की बुनियाद रखने वाले पंडित नेहरू की बेटी इंदिरा गांधी का था। तभी से यह तारीख लोगों के जेहन में टंक गई। क्यों और क्या हुआ था तब , पढ़िए उसकी दास्ताँ,

वो दौर ; देवी दुर्गा का मुकुट इंदिरा जी के माथे पर
 
                 1969 के कांग्रेस के ऐतिहासिक विभाजन के बाद इंदिराजी ने समय से पहले जनता की अदालत में जाने का फैसला किया था। इससे पहले 1967 में लोकसभा चुनाव हुए थे। उस चुनाव में लोकसभा में कांग्रेस को 283 सीटें प्राप्त हुई थीं, जो कि 1962 की तुलना में 78 कम थीं। उससे भी बड़ा झटका पार्टी को राज्यों के विधानसभा चुनाव में लगा था। तब नौ राज्यों में गैरकांग्रेसी संविद की सरकारें बन गई थीं। दिसम्बर 1970 में लोकसभा भंग करने के बाद 1971 में इंदिराजी गरीब समर्थक प्रगतिशील छवि के साथ जनता के बीच पहुँची थीं।14 बैंकों के राष्ट्रीयकरण और पूर्व रियासतों के राजाओं के प्रिवीपर्स खात्मे के बाद उनकी लोकप्रियता में जबरदस्त बढोत्तरी हुई थी। कांग्रेस के विभाजन में उन्होंने पुराने दिग्गजों को किनारे लगाकर पार्टी और सरकार पर अपनी पकड़ सिद्ध की थी। 1969 में राष्ट्रपति चुनाव में उनके प्रत्याशी वी.वी.गिरि कांग्रेस के अधिकृत प्रत्याशी नीलम संजीव रेड्डी पर जीत दर्ज कर चुके थे। इंदिराजी की लोकप्रियता चरम पर थी। बिखरे विपक्ष ने साझा चुनौती देने का फैसला किया। कांग्रेस (ओ), स्वतंत्र पार्टी , जनसंघ और संसोपा का महागठबंधन ' बना। इंदिरा हटाओ उसका नारा था। इंदिराजी का पलटवार , ' वे कहते हैं इंदिरा हटाओ - हम कहते हैं गरीबी हटाओ ' बहुत मारक साबित हुआ था। वोटरों ने इंदिराजी की झोली भर दी। 1967 की तुलना में उन्हें 69 ज्यादा अर्थात 352 सीटें प्राप्त हुईं। महागठबंधन को वोटरों ने पूरी तौर पर नकार दिया। सिंडीकेट कांग्रेस ( ओ) को सिर्फ 16 सीटें मिलीं। 1967 में स्वतंत्र पार्टी को 44 सीटें मिली थीं। इस बार संख्या आठ थी। जनसंघ 35 से घटकर 22 और संसोपा 23 से तीन पर पहुँच गई। चरणसिंह के भारतीय क्रांतिदल को सिर्फ एक सीट मिली। इतना ही नहीं। इसी साल बांग्ला देश के निर्माण में उनकी साहसिक -निर्णायक भूमिका । पाकिस्तान पर एकतरफा जीत। और सबसे बड़ी महाशक्ति अमेरिका को ठेंगा दिखा देवी दुर्गा का मुकुट इंदिराजी के माथे पर सज चुका था। उस दौर में वे सिर्फ भारत की निर्विवाद नेता नहीं थीं। दूसरे देशों ने भी उनका लोहा माना था। 

फिर #ढलान

             पर आगे रपटीली ढलान थी। बांग्लादेश का निर्माण शोहरत और पाकिस्तान से हिसाब चुकता करने का मौका लाया तो त्रासदियों का सैलाब भी। वहाँ से आये एक करोड़ से ज्यादा शरणार्थियों का बोझ देश पर आया। 1972 से लगातार तीन साल तक सूखा पड़ा। अनाज उत्पादन आठ फीसद घट गया। कीमतों में जबरदस्त उछाल आया। खाद्यान्न के थोक व्यापार को सरकार ने हाथों में लिया और फिर समस्याएं बढ़ते ही उससे पिंड छुड़ाया। खाद्यान्न व्यापार के राष्ट्रीयकरण की अफवाह के बीच बाजार से अनाज गायब होने लगे। देश के अनेक हिस्सों में उसके लूट की घटनाएं हुईं। तेल निर्यातकों के संगठन ओपेक ने कच्चे तेल के दामों में चार गुनी तक वृद्धि कर दी , जिसका सीधा असर तमाम वस्तुओं की कीमतों पर आया। 1974 आने तक महंगाई की दर तीस फीसदी को छूने लगी। औद्योगिक अशांति, कारखानों की बंदी , श्रमिक हड़ताल इन सबका सीधा असर जनजीवन पर पड़ा। 1972-73 में अकेले बम्बई में 12 हजार हड़तालें हुईं। बेरोजगारी का दायरा और बढ़ा। 1974 में जार्ज फर्नांडिस की अगुवाई में 14 लाख कर्मचारियों की रेल हड़ताल को यद्यपि केंद्र ने सख्ती से कुचल दिया लेकिन इसने सरकार के खिलाफ एक और बड़े वर्ग को लामबंद कर दिया। 

पोखरण और सिक्किम विलय भी बेअसर

           सत्तादल को अब सरकार के प्रगतिशील उपायों में न्यायपालिका बाधक नजर आने लगी थी। पार्टी के भीतर वामपंथी रुझान के स्वरों ने प्रतिबद्ध न्यायपालिका की जरूरत का राग छेड़ दिया। अप्रैल 1973 में इसी कोशिश के तहत सर्वोच्च न्यायालय के तीन न्यायधीशों जस्टिस हेगड़े, जस्टिस शेलेट और जस्टिस ग्रोवर की वरिष्ठता को अतिक्रमित करके जस्टिस ए. एन. रे को मुख्यं न्यायाधीश नियुक्त कर दिया गया। इंदिराजी का मन संसदीय कार्यवाही से उचटने लगा था। कम्युनिस्ट नेता हीरेन मुखर्जी ने 1973 में लिखा , ' उनके पिता संसद की कार्यवाही में हिस्सा लेकर खुश होते थे , जबकि इंदिराजी उससे उदासीन नजर आती हैं। कभी-कभी लगता है कि वह राष्ट्रपति प्रणाली की सरकार तो नहीं चाहतीं ? ' इस संकट के बीच इंदिराजी ने दो बड़े साहसिक कदम उठाए। 18 मई 1974 को पोखरण में पहला परमाणु परीक्षण किया। 8 अप्रैल 1975 को सिक्किम के चोग्याल को उनके महल में नजरबंद कर दिया गया। सिक्किम का भारत में विलय हो गया और वह देश का 22वां प्रदेश बन गया। अन्य किसी समय में यह दो बड़े काम प्रधानमंत्री को देश के भीतर बेहद लोकप्रिय बनाकर और मजबूत करते। लेकिन आंतरिक अशांति और बेकाबू जन समस्याओं के बीच ये बड़ी उपलब्धियाँ भी अनुकूल राजनीतिक असर नहीं दिखा सकीं।

सत्ता - विपक्ष के बीच बढ़ती दूरी

             सरकार और विपक्ष की कटुता बढ़ रही थी। इंदिराजी को हर समस्या के पीछे #विदेशी और विपक्ष की साजिश नजर आ रही थी। उनके हर भाषण में जोर-शोर से विपक्ष पर हमले होते। 1971 के चुनाव में साफ हो गए विपक्ष को फिर से खड़ा होने का मौका मिल रहा था। 1974 के #जबलपुर लोकसभा उपचुनाव में साझा विपक्ष के प्रत्याशी #शरद_यादव की जीत ने विरोधी दलों का हौसला बढ़ाया। लेकिन उसे असली ताकत गुजरात के छात्र आंदोलन ने दी। 20 दिसम्बर 1973 को एल. डी. इंजीनियरिंग कालेज के छात्र मेस खर्च में 20 फीसद बढोत्तरी के खिलाफ सड़कों पर उतरे। 3 जनवरी 1974 को हड़ताल में गुजरात विश्वविद्यालय के छात्र भी शामिल हो गए। 7 जनवरी को पूरे प्रदेश के छात्र सड़कों पर थे। फिर इसमें श्रमिक, मध्यवर्ग, वकील, शिक्षक सब जुड़ते गए और नई मांगें शामिल होती गईं। 

अशांत गुजरात बना टकराव का केंद्र

       10 जनवरी से दो दिन के लिए अहमदाबाद और बड़ोदरा बंद रहा। 25 जनवरी को प्रांतव्यापी हड़ताल के दौरान 33 शहरों में हिंसक टकराव हुआ। सेना बुलानी पड़ी। 44 शहरों में कर्फ्यू लगा। भ्रष्टाचार और नाकामियों से घिरी गुजरात की चिमनभाई पटेल सरकार आंदोलनकारियों के निशाने पर थी। महीने भर के भीतर हिंसक वारदातों में लगभग 100 जानें गईं। 3000 से ज्यादा घायल हुए। 8000 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुईं। इंदिराजी को चिमनभाई को इस्तीफे के लिए कहना पड़ा। 9 फरवरी को उन्होंने इस्तीफा दिया। केंद्र को अपने ही दल द्वारा शासित राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़ा। ऐसा राज्य जिसकी 167 सदस्यों की असेम्बली में कांग्रेस के 140 चुन कर आये थे। 11 फरवरी को जेपी गुजरात पहुँचे। छात्रों- युवाओं का जोश और बढ़ा। आंदोलन की ताकत और दबाव विधायकों के इस्तीफों से परखा जा सकता है। 16 फरवरी को कांग्रेस (ओ) के 15 विधायकों ने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दिया। फिर इसमें जनसंघ के तीन विधायक जुड़े। आखिर तक छात्रों ने 95 विधायकों को इस्तीफे के लिए मजबूर कर दिया। 12 मार्च 1974 को 79 साल के मोरारजी देसाई असेम्बली भंग करने की मांग लेकर अहमदाबाद में आमरण अनशन पर बैठ गए। 16 मार्च को असेम्बली भंग करनी पड़ी। 6 अप्रैल 1975 को मोरारजी भाई एक बार फिर से अनशन पर थे। इस बार मांग भंग विधानसभा के चुनाव कराने की थी। 10 जून को चुनाव हुआ। 

फिर #जयप्रकाश_नारायण के हाथ कमान

        12 जून को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली से लोकसभा के लिए उनका निर्वाचन रद्द कर दिया। उसी दिन इंदिराजी के लिए दूसरी निराश करने वाली खबर गुजरात से थी। पिछले चुनाव की तुलना वहाँ कांग्रेस की 65 सीटें कम हुईं। पार्टी विपक्ष में पहुँची। राज्य में जनता मोर्चा की बाबू भाई पटेल की अगुवाई में पहली गैरकांग्रेसी सरकार बनी। इस बीच गुजरात की आँच दूसरे राज्यों तक पहुँच रही थी। बिहार इसमें आगे था। 18 मार्च 1974 को पटना के छात्र सड़कों पर थे। आह्वान विधानसभा का सत्र न चलने देने का था। कांग्रेस विधायक सुबह ही विधानसभा पहुँच गए। लेकिन छात्रों ने राज्यपाल आर.डी. भंडारे की कार को घेर लिया। इसके बाद पुलिस के लाठी चार्ज -आंसू गैस के गोलों की बरसात के बीच व्यापक हिंसा हुई। छात्रों ने जेपी से अगुवाई की गुजारिश की। लम्बे समय पहले सक्रिय राजनीति से विलग हुए जेपी देश के बिगड़ते हालात से बेचैन थे। इंदिराजी और सांसदों को उन्होंने इस सिलसिले में चिट्ठी भी लिखी थी। उन्होंने छात्रों के सामने राजनीतिक दलों से अलग रहने की शर्त रखी। छात्र राजी हुए। 

#सिंहासन खाली करो कि जनता आती है !

        8 अप्रैल 1975 को लाखों की भीड़ पटना की सड़कों पर जेपी के पीछे थी। 5 जून 1974 पटना के गांधी मैदान में उमड़ा जनसैलाब जेपी के #सम्पूर्ण_क्रांति आह्वान का साक्षी बना। जेपी ने कहा कि मंत्रिमंडल के इस्तीफे और विधानसभा भंग होने भर से बदलाव नहीं आएगा। व्यवस्था परिवर्तन जरूरी है। साल भर के लिए कालेज-विश्वविद्यालय बंद करने और छात्रों-युवकों की शक्ति के समाज-राष्ट्र निर्माण में उपयोग की उन्होंने जरूरत बताई। 7 जून से बिहार विधानसभा भंग अभियान शुरू हुआ। जनसंघ के 24 में 13 विधायकों ने सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया। नेतृत्व के निर्देश के पालन से इनकार करने वाले 11 विधायक पार्टी से निकाल दिए गए। संसोपा के 13 में सात ने इस्तीफा दिया। कांग्रेस (ओ) के 23 में किसी विधायक ने इस्तीफा नहीं दिया। लेकिन इस सबसे अलग जेपी की अगुवाई और प्रमुख विपक्षी दलों के जुड़ाव ने आंदोलन को राष्ट्रीय स्वरूप दे दिया। वे जिस राज्य में भी पहुँचे लोग उन्हें सुनने को उमड़ पड़े। वे पंडित जवाहर लाल नेहरू के मित्र रहे थे। उनकी सरकार में शामिल होने या फिर बाद में भी सत्ता से जुड़े हर लाभ को उन्होंने ठुकराया था। उनकी नैतिक सत्ता और आभामंडल किसी भी सत्ता पर भारी था। इंदिराजी के कुछ बयानों और उनसे ज्यादा कुछ चाटुकारों की अशोभनीय टिप्पणियों ने जेपी को सीधे संघर्ष के रास्ते पर खींच लिया। उधर सदन में प्रचंड बहुमत के बावजूद सरकार जन असंतोष को थामने में विफल साबित हो रही थी। जेपी की अगुवाई ने इस असंतोष को और प्रबल किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट के 12 जून के फैसले ने इंदिराजी से शासन का नैतिक हक छीन लिया। फैसले ने विपक्ष को और ताकत दी। डॉक्टर लोहिया याद किये जा रहे थे , ' जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करतीं।' दिनकर दोहराए जा रहे थे , ' सिंहासन खाली करो कि जनता आती है।' नौजवान सिर पर आकाश उठाए थे, " अंधकार में एक प्रकाश - जय प्रकाश - जय प्रकाश " 

लोकतंत्र के सूरज पर 21 महीने का ग्रहण

            गुजरात की सीख ताजा थी । इंदिराजी अब और झुकने के लिए तैयार नहीं थीं। वे जो कदम उठाने जा रही थीं, उसकी उनके सहयोगियों को भी भनक नहीं थी। तारीख थी 25 जून 1975 । उसी शाम दिल्ली के रामलीला मैदान में विपक्षी दलों की विशाल सभा थी। इंदिरा जी से कुर्सी छोड़ने की मांग करते हुए जेपी ने सरकारी अमले और सुरक्षा बलों से अनैतिक सरकार के आदेश न मानने की अपील की। इंदिराजी और जेपी को नजदीक लाने की कोशिश में इंदिराजी से दूर हो गए #चंद्रशेखर उस शाम सुपरहिट फिल्म #शोले देखने रीगल चले गए थे। वापसी में साथी दयानंद सहाय ने कहा कि आज तो जेपी ने भाषण में कमाल कर दिया। चंद्रशेखर ने कहा कि इसे फिलहाल उनका आखिरी भाषण समझो। उसी रात साढ़े तीन बजे पुलिस की एक गाड़ी गांधी शांति प्रतिष्ठान पहुंची। जेपी जगाए गए। फिर पुलिस की गाड़ी में पार्लियामेंट थाने के रास्ते में थे। चंद्रशेखर पीछे - पीछे एक टैक्सी में थे। वे जेपी को लेकर फिक्रमंद थे। पर चंद्रशेखर थाने के बाहर रोक दिए गए। बाद में एक एस.पी. उन्हें भीतर ले गए। बताया कि आप भी गिरफ्तार हैं। पुलिस तब तक कई अन्य विपक्षी नेताओं को थाने ला चुकी थी। जेपी को गिरफ्तारी की सूचना देने में पुलिस हिचकिचा रही थी। चंद्रशेखर ने उनसे कहा, "आपके लिए गाड़ी आ गई है। आप जाइए। हमें दूसरी जगह ले जाया जाएगा। जेपी ने कहा ,"#आप_भी !" फिर जेपी के मुख से फूटा। #विनाशकाले_विपरीत_बुद्धि । इंदिराजी के मित्र बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक इमरजेंसी की योजना लेकर आगे आये थे। योजना पर मन्त्रिमण्डल की सहमति की औपचारिकता अगली सुबह निभाई गई। राष्ट्रपति #फ़ख़रुद्दीन अली अहमद बिना नानुकुर के रात में ही इस पर दस्तख़त कर चुके थे। वह रात विरोधियों पर कहर बन कर टूटी। देशव्यापी गिरफ्तारियां हुईं। वह हर आवाज जो सरकार के विरोध में उठती थी या उठ सकती थी, उसका अगला ठिकाना जेल था। अखबारों की बिजली काटी गई। #सेंसरशिप लागू की गई। नागरिक अधिकार छीन लिए गए। लाखों विपक्षी जेल में थे। बाकी देश खुली जेल था। अगले 21 महीने लोकतंत्र के सूरज पर तानाशाही के ग्रहण के थे।

शनिवार, 11 अप्रैल 2026

सादगी की मिसाल: जब भारत के राष्ट्रपति की बेटी ने गुमनामी में निभाया अपना कर्तव्य


सादगी की मिसाल: जब राष्ट्रपति की बेटी ने गुमनामी में निभाया अपना कर्तव्य
आज के दौर में जहाँ जरा सी शक्ति या पद मिलते ही लोग उसका प्रदर्शन करने से नहीं चूकते, वहीं हमारे बीच कुछ ऐसे भी व्यक्तित्व हैं जो ऊँचे पदों पर रहकर भी ज़मीन से जुड़े रहे। यह कहानी है पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद जी की सुपुत्री स्वाति कोविंद की, जिन्होंने अपनी पहचान उजागर किए बिना वर्षों तक एक साधारण कर्मचारी की तरह काम किया।
विदेशी प्रशंसा बनाम भारतीय वास्तविकता
अक्सर हमारा मीडिया पश्चिमी देशों के उदाहरणों की खूब चर्चा करता है। हमें याद है कि जब पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की बेटी एक रेस्टोरेंट में काम कर रही थीं, तो भारतीय मीडिया सहित दुनिया भर ने उनके संस्कारों की सराहना की थी। निश्चित रूप से, वह तारीफ के काबिल था। लेकिन विडंबना यह है कि हमारे अपने देश में भी संस्कारों की ऐसी ही एक गौरवशाली मिसाल मौजूद थी, जिससे दुनिया लंबे समय तक अनजान रही।

कौन हैं स्वाति कोविंद?
लगभग 5.4 फीट की कद-काठी वाली स्वाति कोविंद कई वर्षों से एयर इंडिया में एक फ्लाइट अटेंडेंट (क्रू मेंबर) के रूप में कार्यरत रही हैं। ताज्जुब की बात यह है कि उनके साथ काम करने वाले सहकर्मियों और एयर इंडिया के प्रबंधन को लंबे समय तक यह भनक भी नहीं लगी कि वह भारत के प्रथम नागरिक, राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की बेटी हैं।
मूल्यों की जीत
एक राष्ट्रपति की बेटी चाहती तो किसी भी बड़े पद या विशेषाधिकार का लाभ ले सकती थी, लेकिन उन्होंने अपने पिता द्वारा दिए गए संस्कारों को प्राथमिकता दी। उन्होंने अपनी मेहनत और सादगी से अपनी पहचान बनाई। यह दर्शाता है कि संस्कार केवल शब्दों में नहीं, बल्कि आचरण में होते हैं।
टाटा समूह का सराहनीय कदम
जब एयर इंडिया का स्वामित्व टाटा समूह के पास आया और उन्हें स्वाति की वास्तविकता का पता चला, तो उन्होंने एक गरिमामय निर्णय लिया। सुरक्षा कारणों और प्रोटोकॉल को ध्यान में रखते हुए, टाटा प्रबंधन ने उन्हें फ्लाइट ड्यूटी से हटाकर एयर इंडिया कार्यालय के 'इंटरनल अफेयर्स डिवीजन' में नियुक्त किया। यह कदम न केवल उनकी सुरक्षा के लिए आवश्यक था, बल्कि उनके समर्पण के प्रति एक सम्मान भी था।
हमें गौरवान्वित होना चाहिए
यह कहानी केवल एक नौकरी की नहीं है, बल्कि उन महान मूल्यों की है जो भारतीय संस्कृति की पहचान हैं:
सादगी: पद का अहंकार न होना।
कर्तव्यनिष्ठा: अपनी पहचान छुपाकर भी पूरी मेहनत से काम करना।
संस्कार: माता-पिता द्वारा दी गई वह शिक्षा जो आपको भीड़ में भी अलग और महान बनाती है।
प्रेसिडेंट रामनाथ कोविंद और उनकी पुत्री स्वाति कोविंद का यह आचरण आज की युवा पीढ़ी और राजनीति के लिए एक मार्गदर्शक है। हमें अपनी मिट्टी के इन हीरों की कहानियों को साझा करना चाहिए ताकि समाज इनसे प्रेरणा ले सके।
जय हिंद, जय भारत! 🇮🇳

#airindia #swatikovind #president 

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

Self-Defense या सिर्फ दिखावा? एक सीधी बात

सुनने में थोड़ा कड़वा लगेगा, लेकिन कहना ज़रूरी है।
आजकल “Self-Defense” के नाम पर जो सिखाया जा रहा है, उसमें से काफी चीजें असल में Self-Defense नहीं हैं। वो सिर्फ दिखावा है… या यूं कहें कि कैमरे के लिए बनाई गई एक्टिंग है।
आपने भी देखा होगा—
एक आदमी धीरे-धीरे हाथ बढ़ाता है, दूसरा आराम से उसका हाथ पकड़ता है, फिर 3-4 स्टेप में उसे गिरा देता है।
सब कुछ इतना साफ और smooth होता है कि देखने वाले को लगता है—“बस, यही सीखना है।”
लेकिन एक सवाल है—
क्या असली हमलावर भी ऐसे ही आएगा


असली दुनिया में क्या होता है?
सड़क पर, किसी गली में, या अचानक हुए हमले में—
कोई आपको पहले से बताता नहीं है
कोई धीरे-धीरे हमला नहीं करता
और सबसे जरूरी—कोई आपके साथ cooperate नहीं करता
वहाँ सब कुछ उल्टा होता है।
हमला अचानक होता है, तेज होता है, और कई बार एक से ज्यादा लोग भी हो सकते हैं।
आपको सोचने का मौका तक नहीं मिलता।
तो फिर सवाल उठता है—
जो चीजें हम इतनी आराम से सीख रहे हैं, क्या वो उस हालत में काम आएंगी


यहाँ सबसे बड़ा धोखा होता है
समस्या ये नहीं है कि लोग कुछ सीख रहे हैं।
समस्या ये है कि लोग गलत चीज को सही समझकर confident हो जाते हैं।
और ये confidence असली खतरा है।
क्योंकि जब असली स्थिति आती है, तब—
body freeze हो जाती है
दिमाग blank हो जाता है
और जो “सीखा” था, वो याद ही नहीं आता
क्योंकि वो कभी real condition में सीखा ही नहीं गया था।


असली Self-Defense कैसा होता है?
सीधी बात—
असली Self-Defense में आपको comfortable नहीं रखा जाता।
आपको pressure में डाला जाता है
unpredictable situations दी जाती हैं
सामने वाला cooperate नहीं करता
और कई बार आप fail भी होते हैं
लेकिन वहीं से सीख शुरू होती है।
क्योंकि असली लड़ाई में कोई perfect technique नहीं होती,
वहाँ सिर्फ आपकी reaction, awareness और mindset काम आता है।

एक simple तर्क समझिए
अगर कोई technique सिर्फ तब काम करती है जब सामने वाला वैसा ही करे जैसा आपने practice किया है—
तो वो technique असली नहीं है।
क्योंकि असली दुनिया में कोई script follow नहीं करता।

कड़वी सच्चाई
Self-Defense कोई performance नहीं है।
ये कोई stage show नहीं है।
ये एक ऐसी चीज है जो सिर्फ तब काम आती है जब सब कुछ गलत हो रहा होता है।
और उस समय—
“आपने क्या देखा” नहीं,
“आपने क्या झेला और practice किया” वही काम आता है।

आखिर में एक बात
अगर आपकी training में कभी डर नहीं लगा…
अगर कभी सांस नहीं फूली…
अगर कभी situation control से बाहर नहीं गई…
तो बहुत सम्भावना है कि आप सिर्फ technique सीख रहे हैं,
Self-Defense नहीं।

आखिरी लाइन
अब फैसला आपका है—
आपको सीखना क्या है?
दिखने वाला Self-Defense…
या काम आने वाला Self-Defense?

जब शासक सलाह नहीं सुनता: रावण, धृतराष्ट्र और ट्रम्प की कहानी

इतिहास और पौराणिक ग्रंथ हमें बार-बार एक ही सीख देते हैं


जब सत्ता में बैठा व्यक्ति अपने बुद्धिमान सलाहकारों की बात नहीं सुनता, तो विनाश तय होता है।
रामायण में रावण ने विभीषण की सलाह ठुकराई,
और महाभारत में धृतराष्ट्र ने विदुर की बातों को नजरअंदाज किया।
नतीजा क्या हुआ?
दोनों ही मामलों में साम्राज्य का पतन।
आधुनिक उदाहरण: डोनाल्ड ट्रम्प
आज के समय में यही पैटर्न हमें आधुनिक राजनीति में भी देखने को मिलता है।
डोनाल्ड ट्रम्प का कार्यकाल इसका एक ताजा उदाहरण बनता जा रहा है।
जून में आने वाली किताब










Regime Change: Inside the Imperial Presidency of Donald Trump
जिसे जोनाथन स्वान और मैगी हैबरमैन ने लिखा है,
उसमें ट्रम्प के फैसलों के अंदर की कहानी सामने आती है।
कैसे लिया गया युद्ध का फैसला
किताब के अनुसार, 11 फरवरी को
बेंजामिन नेतन्याहू व्हाइट हाउस पहुंचे।
उन्होंने ट्रम्प को एक विस्तृत योजना दी—
ईरान पर अचानक हमला,
नेतृत्व को खत्म करना,
और कुछ ही हफ्तों में सत्ता परिवर्तन।
यह योजना सुनने में जितनी आकर्षक थी,
उतनी ही जोखिम भरी भी।
सलाहकारों ने क्या कहा?
ट्रम्प की टीम में बैठे अनुभवी अधिकारियों ने इस योजना को साफ तौर पर खारिज कर दिया:
जॉन रैटक्लिफ ने इसे “हास्यास्पद” बताया
मार्को रुबियो ने इसे “बकवास” कहा
सेना के अधिकारियों ने इसे अव्यावहारिक और अतिशयोक्तिपूर्ण बताया
उनका साफ कहना था:
👉 सत्ता परिवर्तन कोई आसान खेल नहीं है
लेकिन हुआ क्या?
सभी चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए
ट्रम्प ने इस योजना को समर्थन दिया।
और फिर वही हुआ जो इतिहास में बार-बार हुआ है—
युद्ध शुरू हुआ
लक्ष्य हासिल नहीं हुए
अंत में पीछे हटना पड़ा
दुनिया भर में इसे
👉 अमेरिकी हार के रूप में देखा गया
कूटनीति की असफलता
स्थिति इतनी बिगड़ गई कि अंततः युद्धविराम के लिए
अमेरिका को पीछे हटना पड़ा।
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया कि—
शक्ति से ज्यादा महत्वपूर्ण है सही निर्णय,
और सही निर्णय के लिए जरूरी है सही सलाह को सुनना।
चाणक्य और मैकियावेली की चेतावनी
चाणक्य की नीति हो या
निकोलो मैकियावेली के सिद्धांत—
दोनों एक ही बात कहते हैं:
👉 “एक शासक की सबसे बड़ी ताकत उसके बुद्धिमान सलाहकार होते हैं।”
निष्कर्ष
रावण, धृतराष्ट्र और अब ट्रम्प—
तीनों की कहानी एक ही संदेश देती है:
अहंकार + गलत निर्णय = विनाश
जब शासक खुद को सबसे बुद्धिमान समझने लगता है,
तब उसका पतन शुरू हो जाता है।







अंतिम बात
इतिहास केवल पढ़ने के लिए नहीं होता,
बल्कि उससे सीखने के लिए होता है।
लेकिन समस्या तब होती है जब
शासक इतिहास से सीखना ही बंद कर देता है।

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गुरुवार, 2 अप्रैल 2026

जब राम की निकटता पाने के लिए हनुमान ने पूरे शरीर पर लगा लिया सिंदूर

रामायण के अनंत प्रसंगों में हनुमान जी की भक्ति के कई रूप देखने को मिलते हैं, लेकिन 'सिंदूर' वाला यह प्रसंग उनकी मासूमियत और प्रभु के प्रति उनके अनन्य प्रेम की पराकाष्ठा है। यह कहानी हमें सिखाती है कि जब भक्ति चरम पर होती है, तो तर्क और पांडित्य गौण हो जाते हैं।


एकांत की मर्यादा और हनुमान का तर्क
लंका विजय के पश्चात अयोध्या में उत्सव का माहौल था। श्रीराम का राज्याभिषेक हो चुका था। दरबार की व्यस्तताओं के बाद जब श्रीराम अपने निजी कक्ष में माता सीता और अपने भाइयों के साथ विश्राम के लिए आए, तो हनुमान जी भी उनके पीछे-पीछे चले आए।
परिवार के अन्य सदस्य चाहते थे कि श्रीराम और माता सीता को कुछ समय एकांत में मिले। शत्रुघ्न जी ने संकेतों में हनुमान जी को जाने का आग्रह किया, लेकिन राम-नाम में रमे हनुमान भला मामूली संकेतों को कहाँ समझने वाले थे। अंततः जब उन्हें स्पष्ट कहा गया कि प्रभु को 'एकांत' चाहिए, तो हनुमान जी ने बड़ी मासूमियत से पूछा— "माता सीता भी तो यहीं हैं, फिर मुझे ही क्यों जाना चाहिए?"
एक चुटकी सिंदूर का रहस्य
तब शत्रुघ्न जी ने उन्हें समझाया कि माता सीता को प्रभु के साथ रहने का अधिकार प्राप्त है और उनके माथे का सिंदूर इसी सुहाग और अधिकार का प्रतीक है। श्रीराम ने भी मुस्कुराते हुए कहा, "हनुमान, यह सनातन प्रथा है।"
हनुमान जी के मन में यह बात घर कर गई। उनके लिए ज्ञान या शास्त्र से बड़ा वह 'उपाय' था जिससे उन्हें अपने आराध्य के साथ रहने का अधिकार मिल जाए।
अयोध्या में कौतूहल और हनुमान का रूप
अगली सुबह जब दरबार लगा, तो पूरी अयोध्या में एक ही चर्चा थी— हनुमान जी ने रात भर में नगर की सभी दुकानों का सिंदूर लेकर खुद को उससे रंग लिया था। जब हनुमान जी राजसभा में आए, तो उनका पूरा शरीर केसरिया सिंदूर से लथपथ था। उनके चलने से सिंदूर की धूल उड़ रही थी।
पूरी सभा उन्हें देखकर हंसने लगी। लक्ष्मण जी ने कौतूहलवश पूछा— "कपिश्रेष्ठ! यह आपने क्या किया? यह कैसा रूप है?"
हनुमान जी ने बड़े आत्मविश्वास और प्रसन्नता से उत्तर दिया:
"प्रभु! कल ही ज्ञात हुआ कि मात्र एक चुटकी सिंदूर लगाने से आप पर अधिकार मिल जाता है। मैंने सोचा कि यदि माता सीता चुटकी भर सिंदूर से आपके साथ रह सकती हैं, तो मैं अपने पूरे शरीर पर सिंदूर लगाकर सदैव आपके निकट रहने का अधिकार क्यों न पा लूँ? अब तो कोई मुझे आपसे दूर नहीं करेगा न?"

भरत की आंखों में अश्रु: भक्ति का सर्वोच्च शिखर
जहाँ सभा हनुमान जी के इस 'वानर स्वभाव' पर हंस रही थी, वहीं भरत जी की आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी। उन्होंने शत्रुघ्न से कहा:
"अनुज, यह उपहास का नहीं, वंदन का विषय है। देखो, वह वीर जो अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का स्वामी है, जो वेदों का ज्ञाता और राजनीति का पंडित है, उसने राम की निकटता पाने के लिए अपना सारा पांडित्य और अहंकार त्याग दिया है। ऐसी निश्छल भक्ति के आगे तो ब्रह्मा का पद भी तुच्छ है।"
सीख (Conclusion)
हनुमान जी का यह 'सिंदूर लेपन' केवल एक घटना नहीं, बल्कि भक्त का भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण है। जहाँ तर्क समाप्त होता है, वहीं से सच्ची श्रद्धा शुरू होती है। आज भी बजरंगबली को सिंदूर चढ़ाने की परंपरा इसी अटूट प्रेम की याद दिलाती है।
जय श्री राम! जय पवनपुत्र हनुमान!

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True Story

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