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जब राम की निकटता पाने के लिए हनुमान ने पूरे शरीर पर लगा लिया सिंदूर

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रामायण के अनंत प्रसंगों में हनुमान जी की भक्ति के कई रूप देखने को मिलते हैं, लेकिन 'सिंदूर' वाला यह प्रसंग उनकी मासूमियत और प्रभु के प्रति उनके अनन्य प्रेम की पराकाष्ठा है। यह कहानी हमें सिखाती है कि जब भक्ति चरम पर होती है, तो तर्क और पांडित्य गौण हो जाते हैं। एकांत की मर्यादा और हनुमान का तर्क लंका विजय के पश्चात अयोध्या में उत्सव का माहौल था। श्रीराम का राज्याभिषेक हो चुका था। दरबार की व्यस्तताओं के बाद जब श्रीराम अपने निजी कक्ष में माता सीता और अपने भाइयों के साथ विश्राम के लिए आए, तो हनुमान जी भी उनके पीछे-पीछे चले आए। परिवार के अन्य सदस्य चाहते थे कि श्रीराम और माता सीता को कुछ समय एकांत में मिले। शत्रुघ्न जी ने संकेतों में हनुमान जी को जाने का आग्रह किया, लेकिन राम-नाम में रमे हनुमान भला मामूली संकेतों को कहाँ समझने वाले थे। अंततः जब उन्हें स्पष्ट कहा गया कि प्रभु को 'एकांत' चाहिए, तो हनुमान जी ने बड़ी मासूमियत से पूछा— "माता सीता भी तो यहीं हैं, फिर मुझे ही क्यों जाना चाहिए?" एक चुटकी सिंदूर का रहस्य तब शत्रुघ्न जी ने उन्हें समझा...