₹35 से पद्मश्री तक — नाना पाटेकर की कहानी
₹35 से पद्मश्री तक — नाना पाटेकर की कहानी
कुछ लोग अभिनेता बनते हैं, और कुछ लोग अपने जीवन को इतना गहराई से जीते हैं कि उनका अभिनय भी जीवन का आईना बन जाता है। नाना पाटेकर उन्हीं कलाकारों में से एक थे।
जिस व्यक्ति को आज भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं में गिना जाता है, उसने अपने सफर की शुरुआत किसी फिल्मी परिवार से नहीं, बल्कि संघर्ष से की थी।
मुंबई में आर्थिक कठिनाइयों के बीच किशोर उम्र में नाना पाटेकर ने फिल्म पोस्टर पेंट करने का काम किया। रिपोर्टों के अनुसार उस समय उन्हें करीब ₹35 महीने मिलते थे और एक वक्त का भोजन भी। पढ़ाई के साथ काम करना उनकी मजबूरी थी, लेकिन शायद यही संघर्ष आगे चलकर उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी ताकत बना।
नाना ने सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट/इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से कला की शिक्षा ली। यानी जिस हाथ में कभी फिल्म के पोस्टर का ब्रश था, उसी हाथ ने आगे चलकर भारतीय सिनेमा में अभिनय की ऐसी लकीर खींची जिसे मिटाना आसान नहीं।
फिर आया रंगमंच और सिनेमा
नाना पाटेकर ने अभिनय की दुनिया में कदम रखा और वर्ष 1978 की फिल्म 'गमन' से उनका फिल्मी सफर शुरू हुआ। लेकिन पहचान उन्हें तुरंत नहीं मिली। वर्षों तक उन्होंने संघर्ष किया, छोटे-बड़े किरदार निभाए और रंगमंच से अपनी अभिनय क्षमता को लगातार निखारा।
फिर आया 'परिंदा'।
इसके बाद 'क्रांतिवीर', 'अग्निसाक्षी', 'अब तक छप्पन', 'वेलकम', 'राजनीति' और 'नटसम्राट' जैसी फिल्मों ने यह साबित कर दिया कि नाना केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि अपने आप में एक अभिनय संस्था हैं।
उनकी आवाज, संवाद बोलने का अंदाज और आंखों से भाव व्यक्त करने की क्षमता उनकी पहचान बन गई।
'क्रांतिवीर' के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। इसके अलावा परिंदा और अग्निसाक्षी के लिए भी उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार मिले। इस तरह उनके खाते में कुल तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार आए।
लेकिन नाना की कहानी सिर्फ सिनेमा की कहानी नहीं है...
उनके जीवन का एक और अध्याय भारतीय सेना से जुड़ा था।
फिल्म 'प्रहार: द फाइनल अटैक' के लिए नाना पाटेकर ने वास्तविक सैन्य प्रशिक्षण लिया। उन्होंने मराठा लाइट इन्फैंट्री के जवानों के साथ कठोर प्रशिक्षण किया। यही नहीं, उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने करीब तीन वर्ष तक सैन्य प्रशिक्षण और जवानों के साथ अभ्यास किया था।
यह सिर्फ किसी फिल्मी भूमिका की तैयारी नहीं थी।
1999 में जब कारगिल युद्ध हुआ, तब नाना ने सेना के जवानों के साथ मोर्चे के करीब जाने की इच्छा जताई। विशेष अनुमति लेकर वे युद्ध क्षेत्र में सैनिकों के साथ रहे। उन्होंने बाद में अपने अनुभवों के बारे में बताया कि वे सैनिकों के साथ रहे और क्विक रिएक्शन टीम (QRT) के साथ भी जुड़े रहे।
यही वह जगह है जहां नाना पाटेकर और उनके निभाए किरदार के बीच का अंतर धुंधला होता दिखाई देता है।
जिस अभिनेता ने पर्दे पर सैनिक का किरदार निभाया, उसने वास्तविक जीवन में भी सैनिकों के बीच जाकर उस जीवन को महसूस किया।
संघर्ष से सम्मान तक
नाना पाटेकर की उपलब्धियां केवल पुरस्कारों की सूची नहीं हैं।
एक ऐसा बच्चा जिसने आर्थिक तंगी में फिल्म पोस्टर पेंट किए...
जिसने पढ़ाई के साथ काम किया...
जिसने थिएटर में खुद को तराशा...
जिसने वर्षों तक पहचान के लिए संघर्ष किया...
जिसने फिल्मों में अलग-अलग तरह के किरदार निभाए...
और जिसने सेना के अनुशासन और कठिन प्रशिक्षण को भी अपने जीवन का हिस्सा बनाया...
उसी कलाकार को भारत सरकार ने वर्ष 2013 में कला के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया। सरकारी पद्म पुरस्कार रिकॉर्ड में उनका नाम 'Vishwanath Dinkar Patekar alias Nana Patekar' के रूप में दर्ज है।
₹35 की नौकरी से पद्मश्री तक...
नाना पाटेकर की कहानी हमें यह बताती है कि शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन मंजिल छोटी होना जरूरी नहीं।
कभी पोस्टर पर रंग भरने वाला एक संघर्षशील लड़का आगे चलकर करोड़ों दिलों में अपने अभिनय के रंग भर गया।
उनकी कहानी सिर्फ बॉलीवुड की सफलता की कहानी नहीं है।
यह कहानी है संघर्ष की।
अनुशासन की।
कला की।
देश के प्रति सम्मान की।
और सबसे बढ़कर—अपने रास्ते पर टिके रहने की।
₹35 महीने से शुरू हुआ सफर पद्मश्री तक पहुंचा।
और शायद नाना पाटेकर की सबसे बड़ी उपलब्धि कोई पुरस्कार नहीं, बल्कि यह है कि उन्होंने अपने अभिनय से यह साबित किया कि सच्चा कलाकार किरदार को सिर्फ निभाता नहीं—उसे जीता है।

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